अमर शहीद भगत सिंह

देशप्रेम से ओत प्रोत व्यक्ति सदा अपने देश के प्रति कर्तव्यों के पालन हेतु के केवल तत्पर रहता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राण न्योछावर करने से पीछे नहीं हटता है। स्वतंत्रता से पूर्व हमारे देश का इतिहास ऐसे ही देशभक्तों की वीरतापूर्ण गाथाओं से भरा है। जिसमे भगत सिंह का नाम स्वतः ही युवाओं के दिलो में देशभक्ति का जोश की भावना पैदा करता है।

स्वतंत्रता की बलि वेदी पर अपने आप को कुर्बान कर उन्होंने भारत में न केवल क्रांति की एक लहर पैदा की, बल्कि अंग्रेजी सरकार के अंत का शुरुआत कर दी थी। यही कारण है कि भगत सिंह आजतक तक अधिकतर भारतीयों युवाओं का आदर्श बने हुए है और अब तो भगत सिंह का नाम करती का पर्याय बन चुका है। भगत सिंह अपने जीवन काल में ही अत्यधिक प्रसिद्ध एवम् युवाओं का आदर्श बन चुके थे। उनकी प्रसिद्धि से प्रभावित होकर पट्टाभि सीतारमैया ने कहा था -” यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा की भगत सिंह का नाम भारत में उतना ही लोकप्रिय है, जितना गांधी जी का ” 

भगत सिंह का जन्म 27 दिसंबर 1907 को पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा नामक गांव में  एक देशभक्त सीख परिवार म हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह एवम् उनके चाचा अजित सिंह तथा स्वर्ण सिंह अंग्रेजो के खिलाफ होने के कारण जेल में बंद थे।जिस दिन भगत सिंह का जन्म हुआ था उसी दिन उसके पिता एवम् चाचा जेल से रिहा हुए थे, इसलिए उनकी दादी ने उन्हें अच्छे भाग्य वाला मान कर उनका नाम भगत सिंह रख दिया था। देशभक्त परिवार में जन्म लेने के कारण इसे बचपन से ही देशभक्ति और स्वतंत्रता का पाठ पढ़ने को मिला।

इनका प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव में ही हुई। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें वर्ष 1916-17 में लाहौर KDAV स्कूल में भर्ती कराया गया। रौलेट एक्ट के विरोध में संपूर्ण भारत में जगह – जगह प्रदर्शन किए जाने के दौरान  13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग हत्याकांड में हजारों निर्दोष भारतीय मारे गए। इस नरसंहार की पूरे देश में हाहाकार मच गया। इस काण्ड की समाचार सन कर वे लाहौर से अमृतसर पहुंचे और जलियांवाला बाग की मिट्टी एक बोतल में भरकर अपने पास रख ली , ताकि उन्हें याद रहे कि देश की इस अपमान का बदला उन्हें अत्याचारी अंग्रेजो से लेना है।

वर्ष 1920 में जब महात्मा गांधी में असहयोग आन्दोलन की घोषणा की , तब भगत सिंह ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और देश को स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े, किन्तु लाला लाजपत राय ने लाहौर में जब नेशनल कॉलेज की स्थापना की, तो भगत सिंह भी इसमें दाखिला लिया।इसी काॅलेज म वे यशपाल, सुखदेव, तीर्थराम एवम् झंडा सिंह जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।  भगत सिंह की आत्मकथा ‘ दी डोर टू देथ ‘ ‘आइडियल ऑफ सोशलिज्म ‘,’ स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का पहला उभार’ तथा ‘ मै नास्तिक क्यों हूं ‘ नामक कृतियों की रचना की।

वर्ष 1928 में साइमन कमीशन जब भारत आया , तो लोगो ने इसका विरोध में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में एक जुलूस निकला। इस जुलूस में लोगो की भीड़ बढ़ती जा रही थी। इतने व्यापक विरोध को देख कर सहायक अधीक्षक सांडर्स बौखला गया और उसने उसने भीड़ पर लाठी चार्ज करवा दिया। इस लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय इतनी बुरी तरह से घायल हो गए की 17नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।

यह खबर भगत सिंह के लिए आघात से कम नहीं थी, उन्होंने तुरंत लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने का फैसला कर लिया और राजगुरु सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर सांडर्स की हत्या का योजना बनाई। भगत सिंह की योजना से अंततः सबने मिलकर सांडर्स की गोली मार कर हत्या कर दी। इस घटना ने भगत सिंह को पूरे देश में लोकप्रिय क्रांतिकारी के रूप में प्रसिद्ध कर दिया।

भगत सिंह नौजवान भारत सभा, कीर्ति किसान पार्टी तथा हिंदुस्तान सोसिलिस्ट रिपब्लिक एसोशियन से संबंधित थे। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी की केंद्रीय कार्यकारणी की सभा ने जब पब्लिक सेफ्टी बिल एवम् डिस्प्यूट बिल का विरोध करने के लिए केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने का उनका उद्देश्य केवल विरोध जताना था, इसी लिए बम फेंकने के बाद कोई क्रांतिकारी वहां से भगा नहीं । भगत सिंह समेत सभी क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

 इस गतविधी में इनके सहायक बने बटुकेश्वर दत्त को 12 जून 1929 को सेशंस जज ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा -307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा -3 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को नए सिरे से फसाने की कोशिश शुरू कर दी। अदालत की कार्यवाही कितने दिनों तक चली। 26 अगस्त 1930 को अदालत की कार्य लगभग पूरा हो गया। अदालत ने 7 अक्टूबर को 68 पृष्ठो का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा निश्चित की गई थीं।इस निर्णय के विरुद्ध नवंबर 1930 में प्रिवी काउंसिल में अपील दायर की गई किन्तु यह अपील भी 10 जनवरी 1931 को रद्द कर दी गई।

 भगत सिंह को फांसी की सुनाए जाने के बाद से पूरे देश में क्रांति की एक अनोखी लहर उत्पन्न हुई । क्रांति की इस लहर से अंग्रेज सरकार डर गई। फांसी का समय 24 मार्च 1931 निर्धारित किया गया था, किन्तु सरकार ने जनता की क्रांति की दर से कानून के विरूद्ध जाते हुए 23 मार्च को सायंकाल उन्हें फांसी देने का निश्चय किया। जेल अधीक्षक जब फांसी लगाने के लिए भगत सिंह को लेने कोठरी मे गए तो उस समय वे लेनिन के जीवन चरित्र पढ़ रहे थे।

जेल अधीक्षक ने उन्हें कहा, “सरदार जी ,फांसी की वक्त हो गया है, आप तैयार हो जाइए।” इस बात पर भगत सिंह ने कहा-” ठहरो,एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।” जेल अधीक्षक आश्चर्यचकित होकर उन्हें देखते रह गया । वह किताब पूरी करने के बाद वे साथ चल दिए। उसी समय सुखदेव और राजगुरु को भी फांसी स्थल पर लाया गया। तीनो को एक साथ फांसी दे दी गई। फांसी देने के बाद रात के अंधेरे में अंतिम संस्कार कर दिया गया। उन तीनों को जब फांसी दिए जा रहे थे तीनो एक सुर में गा रहे थे 

” दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू- ए- वतन आएगी।”

अंग्रेज सरकार ने इसे फांसी देकर समझ लिया था कि उन्होंने उसका खात्मा कर दिया , परन्तु यह उनकी भूल थी। भगत सिंह अपना बलिदान देकर अंग्रेजी सम्राज्य की समाप्ति का अध्याय शुरू कर चुके थे। भगत सिंह जैसे लोग कभी मरते नहीं , वे अत्याचार के खिलाफ हर आवाज़ के रूप में जिंदा रहेंगे और युवाओं को मार्गदर्शन करते रहेंगे। उनका नारा ‘ इन्कलाब जिंदाबाद ‘ सदा युवाओं के दिल में जोश भरता रहेगा।

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