बेरोज़गारी

एक बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिण्टन ने कहा था- ” बिना उन्हें रोज़गार मिले , जो रोज़गार चाहते हैं , समाज के बुनियादी ढाँचे को दुरुस्त किए जाने की बात पर मैं यकीन नहीं कर सकता । ” सचमुच आज बेरोज़गारी अथवा बेकारी हमारे देश की ही नहीं , बल्कि पूरे विश्व की एक बड़ी विकट समस्या है ।


 बेरोज़गारी का अर्थ है- कार्यसक्षम होने के बावजूद एक व्यक्ति को उसकी आजीविका के लिए किसी रोज़गार कान मिलना । अर्थात् जब समाज में प्रचलित पारिश्रमिक दर पर भी काम करने की इच्छुक एवं सक्षम व्यक्तियों को कोई कार्य नहीं मिलता , तब ऐसे व्यक्तियों को बेरोजगार तथा ऐसी समस्या को बेरोजगारी की समस्या कहा जाता है । रोजगार अभाव में व्यक्ति असहाय हो जाता है । ऐसे में अनेक प्रकार के अवसाद उसे घेर लेते हैं , फिर तो न चाहते हुए भी कई बारवह ऐसे कदम उठा लेता है , जिनकी कानून इज़ाज़त नहीं देता । राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन ( NSSO ) ने बेरोज़गारी को इस प्रकार से परिभाषित किया है- “ यह वह अवस्था है , जिसमें काम के अभाव में लोग बिना कार्य के रह जाते हैं । ये कार्यरत व्यक्ति नहीं हैं , किन्तु रोज़गार कार्यालयों , मध्यस्थों , मित्रों , सम्बन्धियों आदि के माध्यम से या सम्भावित रोजगारदाताओं को आवेदन देकर या वर्तमान परिस्थितियों और प्रचलित मज़दूरी दर पर कार्य करने की अपनी इच्छा प्रकट कर कार्य तलाशते हैं । ” 


भारत में बेरोज़गारी के आँकड़ों के तीन स्रोत भारत की जनगणना रिपोर्ट , राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन ( एनएस एसओ ) की रोजगार एवं बेरोजगारी सम्बन्धी रिपोर्ट तथा रोज़गार और प्रशिक्षण महानिदेशालय के रोज़गार कार्यालय में पंजीकृत आँकड़े हैं ।


वर्ष 2015-16 के दौरान श्रम एवं रोजगार मन्त्रालय द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार , भारत में वर्ष 2017-18 के बीच रोजगार सृजन की गति पकड़ने की सम्भावना है , क्योंकि इस दौरान धीरे – धीरे बेरोजगारी बढ़ेगी और प्रतिशत के सन्दर्भ में इसमें गतिहीनता दिखाई देगी । इस रिपोर्ट के अनुसार , “ आशंका है कि पिछले साल के 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में वर्ष 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ और उसके अगले साल 1.8 करोड़ हो सकती है । प्रतिशत के सन्दर्भ में 2017-18 में बेरोजगारी दर 3.4 % तक बनी रहेगी । इस रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि वर्ष 2016 में भारत की 7.6 % की वृद्धि ने दक्षिण एशिया के 6.8 % की वृद्धि दर हासिल करने में मदद की है । 


आइए , बेरोज़गारी की समस्या के कारणों को जानने से पहले इसकी स्थितियों को जान लेते हैं । दरअसल , बेरोज़गारी की कई स्थितियाँ होती हैं ।


 इस दृष्टिकोण से भारत में प्राय : निम्नलिखित प्रकार की बेरोज़गारी देखी जाती हैै।


• खुली बेरोज़गारी इससे तात्पर्य उस बेरोज़गारी से है , जिसमें व्यक्ति को कोई काम नहीं मिलता । यह सबसे गम्भीर समस्या है , इसमें कुशल अथवा अकुशल श्रमिक को बिना काम किए ही रहना पड़ता है । गाँवों से शहरों की ओर लोगों का पलायन इसकी मुख्य वजह है ।


•शिक्षित बेरोजगारी शिक्षित बेरोज़गारी भी खुली बेरोज़गारी जैसी ही है , किन्तु इसमें थोड़ा – सा अन्तर यह है कि व्यक्ति को उसकी शैक्षणिक योग्यता के अनुसार काम नहीं मिलता ; उदाहरणार्थ- राजमिस्त्री को काम के अभाव में मज़दूर का काम करना पड़े । भारत में यह एक गम्भीर समस्या है । 


• घर्षणात्मक बेरोज़गारी बाज़ार में आए उतार – चढ़ाव या मांग में परिवर्तन जैसी स्थितियों के कारण उत्पन्न बेरोज़गारी की अवस्था घर्षणात्मक बेरोजगारी कहलाती है । 


• मौसमी बेरोज़गारी यह मुख्य रूप से कृषि क्षेत्रों में पाई जाती है , इसमें कृषि श्रमिक वर्ष के कुछ महीने कृषि कार्य में संलग्न होते हैं तथा शेष अवधि में बेकार पड़े रहते हैं । भारत में कृषि क्षेत्र में सामान्यत : 7-8 महीने ही काम चलता है , शेष महीनों में कृषि में लगे लोगों को बेरोज़गार रहना पड़ता है । ऐसी बेरोज़गारी ही मौसमी बेरोज़गारी कहलाती है । 
• शहरी बेरोजगारी बड़े पैमाने पर शहरीकरण किए जाने के दौरान शहरों में बढ़ती जनसंख्या की तुलना में रोज़गार के अत्यस्तरों का विस्तार नहीं हो पाता , वहीं गाँवों में रोजगार नहीं मिलने के कारण भी लोग शहर की ओर पलायन करते हैं , परन्तु शहरों में सभी को काम नहीं मिल पाता । ऐसी बेरोज़गारी शहरी बेरोज़गारी कहलाती है । 


• ग्रामीण बेरोजगारी गाँवों के लोग पहले आपस में ही कामों का बँटवारा कर लेते थे । कोई कृषि कार्य में संलग्न रहता था , तो कोई गाँव के अन्य कार्यों को सम्पन्न करता था । गाँवों से शहरों की ओर पलायन के कारण गाँवों की यह व्यवस्था समाप्त हो गई , जिससे गाँवों के अधिकतर लोग बेरोज़गार हो गए ।


• संरचनात्मक बेरोज़गारी औद्योगिक क्षेत्र में जब संरचनात्मक परिवर्तन होते हैं , तो इससे कुछ अल्प – दक्ष या अनावश्यक कर्मचारियों की छंटनी के कारण उत्पन्न बेरोज़गारी संरचनात्मक बेरोज़गारी कहलाती है । इसमें तीव्र प्रतियोगिता के कारण पुराने तकनीक वाले उद्योग बन्द होने लगते हैं तथा उनका स्थान नई मशीनें ले लेती हैं । भारत में भी ऐसी बेरोज़गारी पाई जाती है । 


• अल्परोज़गार वाली बेरोज़गारी ऐसे श्रमिक , जिनको कभी – कभी ही काम मिलता है , हमेशा नहीं , इस बेरोज़गारी के अन्तर्गत आते हैं । बेरोज़गारी की इस श्रेणी के अन्तर्गत उन श्रमिकों को भी सम्मिलित किया जाता है , जिन्हें उनकी क्षमता के अनुसार काम नहीं मिल पाता । .


• छिपी हुई अथवा अदृश्य बेरोज़गारी ऐसी बेरोज़गारी प्राय : कृषि क्षेत्र में दिखाई पड़ती है । खेतों में कुछ ऐसे श्रमिक भी कार्य करते हैं , जिन्हें यदि काम से हटा दिया जाए , तो उत्पादन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता । इस स्थिति में लोग कार्य करते तो दिखाई पड़ते हैं , पर वास्तव में देखा जाए तो वे बेरोज़गार ही होते हैं , क्योंकि उत्पादन में उनकी कोई भागीदारी नहीं होती अर्थात् यदि उन्हें इस कार्य से हटा भी दिया जाए तो उत्पादन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है । इसे प्रच्छन्न बेरोज़गारी भी कहा जाता है । प्रच्छन्न बेरोज़गारी की धारणा का उल्लेख सर्वप्रथम श्रीमती जॉन रॉबिन्सन ने किया है । 


बेरोज़गारी के मापन के सम्बन्ध में राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन ( NSSO ) ने बेरोज़गारी मापने के लिए तीन अवधारणाएँ विकसित की हैं।


सामान्य बेरोज़गारी इसमें सामान्यत : यह देखा जाता है कि लोग रोज़गार में होते हुए , बेरोज़गार हैं या श्रम शक्ति से बाहर हैं । इसमें लम्बी अवधि के आँकड़ों का विश्लेषण किया जाता है , अत : यह दीर्घकालिक बेरोज़गारी को दर्शाता है । साप्ताहिक स्थिति बेरोज़गारी इसके अन्तर्गत सप्ताहभर अर्थात् पिछले सात दिनों की गतिविधियों का विश्लेषण कर बेरोज़गारी की माप प्रस्तुत की जाती है । दैनिक स्थिति बेरोज़गारी इसमें व्यक्ति की प्रतिदिन की गतिविधियों पर गौर करके बेरोज़गारी की माप प्रस्तुत की जाती है । 


भारत में बेरोजगारी की दर वर्ष 2015-16 में 5 % तक पहुँच गई है , जो विगत 5 वर्षों में उच्चतम स्थिति में है । इसमें पुरुषों की भागीदारी 4.3 % है , जबकि महिलाओं की भागीदारी 8.7 % है । देश में कुल बेरोजगारी दर 4.9 % ( 2013-14 होने का अनुमान है । देश में बेरोजगारी की दर सर्वाधिक व सबसे कम क्रमश : सिक्किम और गुजरात में है ।


उपरोक्त तीनों अवधारणाओं में दैनिक स्थिति , बेरोज़गारी की सर्वोत्तम माप प्रस्तुत करती है । यदि कुल बेरोज़गारों में युवाओं को देखा जाए , तो वर्ष 1993-94 से 2004-05 की अवधि में ग्रामीण तथा शहरी , दोनों क्षेत्रों में ही बेरोज़गारी दर में वृद्धि हुई है , जो भारतीय अर्थव्यवस्था की तीव्र आर्थिक समृद्धि में बाधक हैं । 
बेरोजगारी की दर से तात्पर्य श्रम शक्ति के उस प्रतिशत से है , जो बिना कार्य के होते हैं । इसकी गणना निम्न प्रकार की जाती है । 


बेरोज़गारी की दर= बेरोजगार श्रमिक × 100/ कुल श्रम शक्ति


हमारे देश में बेरोज़गारी के कई कारण हैं । जनसंख्या में तेज़ी से हो रही वृद्धि इसका एक सबसे बड़ा एवं प्रमुख कारण है । बढ़ती जनसंख्या के जीवन – निर्वहन हेतु अधिक रोज़गार सृजन की आवश्यकता होती है , ऐसा न होने पर बेरोज़गारी वृद्धि होना स्वाभाविक है । भारत में व्यावहारिक के अतिरिक्त सैद्धान्तिक शिक्षा पर जोर दिया जाता है , फलस्वरूप व्यक्ति के पास उच्च शिक्षा की उपाधि तो होती है , परन्तु न तो वह किसी कार्य में दक्ष हो पाता है और न ही अपना कोई निजी व्यवसाय शुरू कर पाता है । 

इस तरह , दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी बेरोज़गारी को बढ़ाने में काफी हद तक ज़िम्मेदार है । देश के प्रथम प्रधानमन्त्री पं . जवाहरलाल नेहरू की ये पंक्तियाँ भी हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली की कमियों को प्रमाणित करती हैं- ” हमारे देश में हर साल नौ लाख पढ़े – लिखे लोग नौकरी के लिए तैयार हो जाते हैं , जबकि यहाँ शतांश के लिए भी नौकरियाँ खाली नहीं । हमारे यहाँ स्नातक के स्थान पर वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की आवश्यकता है । “
पहले अधिकतर ग्रामीण , कुटीर उद्योगों से अपनी आजीविका चलाते थे । ब्रिटिश सरकार की कुटीर उद्योग विरोधी नीतियों के कारण देश में इनका पतन होता चला गया । स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी इसके उत्थान के लिए कुछ विशेष प्रयास नहीं किए गए , जिसके दुष्परिणामस्वरूप गाँवों की अर्थव्यवस्था छिन्न – भिन्न हो गई और ग्रामीण बेरोज़गारी में वृद्धि हुई । औद्योगीकरण की मन्द प्रक्रिया के कारण भी तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या के लिए रोज़गार उपलब्ध करवाना सम्भव नहीं हो सका । हमारा देश प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न है , किन्तु पूँजी एवं तकनीक के अभाव में हम इनका समुचित उपयोग नहीं कर पाते । भारत की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है , किन्तु कृषि के पिछड़ेपन के कारण इस क्षेत्र के लोगों को सालों भर रोजगार नहीं मिल पाता ।


बेरोजगारी के कई दुष्परिणाम होते हैं । बेरोज़गारी के कारण निर्धनता में वृद्धि होती है तथा भुखमरी की समस्या उत्पन्न हो जाती है । बेरोज़गारी के कारण मानसिक अशान्ति की स्थिति में लोगों के चोरी , डकैती , हिंसा , अपराध की ओर प्रवृत्त होने की पूरी सम्भावना रहती है । अपराध एवं हिंसा में हो रही वृद्धि का सबसे बड़ा कारण बेरोज़गारी ही है । कई बार तो रोजगारी की भयावह स्थिति से तंग आकर लोग आत्महत्या भी कर बैठते हैं । युवा वर्ग की बेरोज़गारी का लाभ उठाकर एक ओर जहाँ स्वार्थी राजनेता इनका दुरुपयोग करते हैं , वहीं दूसरी ओर धनिक वर्ग भी इनका शोषण करने से नहीं चूकते । पसी स्थिति में देश का राजनीतिक एवं सामाजिक वातावरण अत्यन्त दूषित हो जाता है । 
सरकार द्वारा बेरोजगारी को दूर करने एवं रोजगार के सृजन तथा युवाओं द्वारा स्वरोजगार उत्पन्न करने हेतु कई बोजनाएँ एवं कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार के सक्षम एवं इच्छुक व्यक्ति को एक वित्तीय वर्ष में कम – से – कम 100 दिनों तक रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम ( 2006 ) का आन्ध्र प्रदेश से शुभारम्भ किया गया ।


ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर के सृजन हेतु केन्द्र सरकार द्वारा अगस्त , 2008 से प्रधानमन्त्री रोजगार सृजन कार्यक्रम ( पीएमइजीपी ) चलाए जा रहे हैं । इस कार्यक्रम में पूर्व की दो योजनाओं प्रधानमन्त्री की रोजगार योजना ( पीएमआइवाई ) व ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम ( आरइजीपी ) का विलय कर दिया गया है । इस कार्यक्रम के अन्तर्गत ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में माइको एण्टरप्राइजेज की स्थापना की जा रही है । 
इसके अतिरिक्त युवाओं के लिए रोजगार सृजन करने के लिए सरकार द्वारा छात्र स्टार्टअप नीति नवम्बर 2016 से चलाई जा रही है । इस नीति का लक्ष्य तकनीकी आधारित छात्र स्टार्टअप की शुरुआत करना है और अगले दस वर्षों में 10 रोजगार के अवसर पैदा करना है । 


नए माँग के अनुरूप युवाओं को स्कील इण्डिया के तहत प्रशिक्षित किया जा रहा है । साथ ही युवाओं में स्वरोजगार को प्रोत्साहन हेतु स्टार्टअप इण्डिया , स्टैण्डप इण्डिया एवं प्रधानमन्त्री मुद्रा बैंक योजना को चलाया जा रहा है । 
जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण कर , शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार करते हुए व्यावसायिक एवं व्यावहारिक शिक्षा पर बल देकर , कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर एवं औद्योगीकरण द्वारा रोज़गार के अधिक अवसर सृजित कर हम बेरोज़गारी की समस्या का काफी हद तक समाधान कर सकते हैं । महात्मा गाँधी ने भी कहा था- ” भारत जैसा विकासशील देश लघु एवं कुटीर उद्योगों की अनदेखी कर विकास नहीं कर सकता । “


ग्रामीण क्षेत्र के लिए अनेक रोज़गारोन्मुख योजनाएं चलाए जाने के बावजूद बेरोज़गारी की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हो रहा है । ऐसी स्थिति के कई कारण हैं । कभी – कभी योजनाओं को तैयार करने की दोषपूर्ण प्रक्रिया के कारण इनका क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पाता या ग्रामीणों के अनुकूल नहीं हो पाने के कारण भी कई बार ये योजनाएँ कारगर साबित नहीं हो पातीं । 


प्रशासनिक खामियों के कारण भी योजनाएँ या तो ठीक ढंग से क्रियान्वित नहीं होती या ये इतनी देर से प्रारम्भ होती कि इनका पूरा – पूरा लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पाता । इसके अतिरिक्त भ्रष्ट शासनतन्त्र के कारण जनता तक पहुंचने से पहले ही योजनाओं के लिए निर्धारित राशि में से दो – तिहाई तक बिचौलिये खा जाते हैं । फलत : योजनाएँ या तो कागज़ तक सीमित रह जाती हैं या फिर वे पूर्णत : निरर्थक साबित होती हैं ।


 बेरोज़गारी की समस्या का समाधान तब ही सम्भव है , जब व्यावहारिक एवं व्यावसायिक रोज़गारोन्मुखी शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर लोगों को स्वरोज़गार अर्थात् निजी उद्यम एवं व्यवसाय प्रारम्भ करने के लिए प्रेरित किया जाए आज देश की जनता को अपने पूर्व राष्ट्रपति श्री वराहगिरि वेंकटगिरि की कही बात- ” प्रत्येक घर एक कुटीर उद्योग है और भूमि की प्रत्येक एकड़ एक चरागाह ‘ से शिक्षा लेकर बेरोज़गारी रूपी दैत्य का नाश कर देना चाहिए ।

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