नगरीकरण पर निबंध

शहरीकरण क्या है।

शहरीकरण/नगरीकरण का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है , जो अधिवासित प्रारूप में गत्यात्मक परिवर्तन लाता है । यह परिवर्तन मूलत जनसंख्या , आकार , संरचना और कार्मिक क्षेत्र में होता है । भारत में कुल 121.08 करोड़ लोगों में से 37,71,06,125 लोग शहरों में निवास करते हैं , जो सम्पूर्ण देश की जनसंख्या का 31.1 % है । देश में 19,54,89,200 पुरुष तथा 18,16,16,925 महिला नगरीय जनंसख्या निवास करती है ।

किसी भी देश की सभ्यता , संस्कृति और विकास में नगरों एवं महानगरों का अपना महत्त्व होता है । भारत का भविष्य ग्रामीण विकास के साथ – साथ नगरों के विकास एवं महानगरीय क्षेत्रों के विकास से जुड़ा है । सामान्यत : लोगों का ग्रामीण परिवेश से निकलकर शहर की ओर पलायन ही  शहरीकरण  कहलाता है ।

समाजशास्त्री एण्डरसन का मानना है कि  शहरीकरण  में न केवल जनसंख्या का नगरों की ओर जाना निहित है , बल्कि जाने वालों की अभिवृत्तियों , विश्वासों , मूल्यो और व्यवहार प्रतिमानों में परिवर्तन भी शामिल है । ‘ नगरीय ‘ शब्द का प्रयोग जनसंख्यात्मक सन्दर्भ के अन्तर्गत जनसंख्या के आकार , जनसंख्या के घनत्व और निवासियों के काम की प्रवृत्ति पर बल देता है , जबकि दूसरे समाजशास्त्रीय अर्थ यह विषमता , अवैयक्तिकता , परस्पर निर्भरता और जीवन की गुणवत्ता पर केन्द्रित है ।

“छटा शहर की लगती ऐसी

जैसे पहने सुबह लिबास

शान्त – अनावृत्त जहाज़ , स्वरयन्त्र

गुम्बद , रंगशाला और मन्दिर

फैले हुए ज़मी – आकाश

सभी चमकते जगमग – जगमग

स्वच्छ हवा में हो साकार । “

शहरीकरण का प्रभाव

यह विलियम वर्ड्सवर्थ की ‘ द सिटी ‘ शीर्षक से लिखी गई कविता का अनूदित रूप है , जिसमें एक शहर के अतिशय रमणीक सौन्दर्य और शुद्ध स्वच्छ वातावरण का वर्णन किया गया है , किन्तु वर्तमान समय में बढ़ते नगरीकरण ने प्रदूषण , अत्यधिक भीड़ , अव्यवस्था , बेरोज़गारी , गरीबी , बीमारी , दुर्घटना , अपराध , यौन – शोषण , हिंसा , संचार व यातायात नियन्त्रण , तनाव , अशान्ति जैसी अनेक समस्याओं को जन्म दिया है । इन सबके बावजूद किसी भी राष्ट्र के निर्माण में नगरों एवं महानगरों की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है ।

नगरों में लोग सामान्यतया गैर – कृषि कार्यों में लगे होते हैं ; जैसे – निर्माण , वाणिज्य , व्यापार , नौकरी एवं विभिन्न पेशों में । नगरीय समुदाय आकार में बड़े होते हैं । यहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक ( 1,000 व्यक्ति प्रतिवर्ग मील से भी अधिक होता है । शहरी क्षेत्रों में लोग मानव – निर्मित वातावरण से घिरे एवं प्रकृति से कटे होते हैं । नगरीय समुदाय अधिक विषम एवं वर्ग के आधार पर स्तरीकृत होता है । नगरीय क्षेत्रों की गतिशीलता ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक होती है । शहरी क्षेत्रों में लोगों के बीच के सम्बन्ध अवैयक्तिक , आकस्मिक , संविदात्मक एवं अल्पकालिक होते हैं ।

शहरीकरण का परिवारिक संबंधों पर प्रभाव।

नगरीकरण न केवल पारिवारिक संरचना को प्रभावित करता है , बल्कि अन्तर्पारिवारिक सम्बन्धों के साथ – साथ परिवार द्वारा किए जाने वाले कार्यों को भी प्रभावित करता है । भारत के नगरीय क्षेत्रों में लोगों के बीच दिन – प्रतिदिन अन्तक्रिया में न तो जाति और न ही धर्म को ही अधिक महत्त्व दिया जाता है । नगरों के लोग जाति प्रतिमानों का कठोरता से पालन नहीं करते ।

नगरों में सहयोग सम्बन्ध , विवाह सम्बन्ध , सामाजिक सम्बन्ध एवं व्यावसायिक सम्बन्ध गाँवों से भिन्न होते हैं । नगरवासी विभिन्न अवसरों पर सामाजिक और आर्थिक सहायता के लिए स्वजातियों एवं नातेदारों की अपेक्षा पड़ोसियों , परिचितों एवं अपने कार्यालय के सहयोगियों पर अधिक निर्भर रहते हैं । नगर के लोग ऐसे आयोजनों में भाग लेते हैं , जिसमें अनेक जातियों , धर्मों एवं विभिन्न सभ्यता – संस्कृति के लोग शामिल रहते हैं ।

शहरीकरण का लाभ।

नगरों में गाँवों की अपेक्षा स्त्रियों की स्थिति अच्छी होती है । शिक्षित होने के कारण नगरों की स्त्रियाँ न केवल अपने आर्थिक , सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहती हैं , बल्कि अपमान एवं शोषण से बचने के लिए वे इन अधिकारों का प्रयोग भी करती हैं । नगरीय क्षेत्रों में शिक्षा के प्रचार – प्रसार से विवाह की आयु में वृद्धि तथा जन्म दर में कमी हुई है , लेकिन इससे दहेज के साथ परम्परागत तयशुदा विवाह के स्वरूप में कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं हुआ है । शहरी स्त्रियाँ नए अवसरों के साथ – साथ सुरक्षा चाहती हैं । वे अपने पुराने मूल्यों को बरकरार रखते हुए नई स्वतन्त्रता का भोग भी करना चाहती हैं ।

तलाक और पुनर्विवाह के मामले शहरी स्त्रियों में अधिक देखने को मिलते हैं । राजनीतिक दृष्टि से भी शहरी स्त्रियाँ अधिक सक्रिय हैं । वे हर स्तर पर चुनाव लड़ने में बढ़ – चढ़कर हिस्सा लेती हैं । शहरों की स्त्रियाँ महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं और उनकी विचारधारा भी स्वतन्त्र है ।

नगरीकरण सामाजिक गतिशीलता के लिए अधिक अवसर प्रदान करता है । आज के युग में व्यक्ति की व्यावसायिक प्रतिष्ठा अधिकतर उसकी शिक्षा पर निर्भर करती है । जितनी ऊँची शिक्षा होगी , उतनी ही ऊँची व्यावसायिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने की सम्भावना बनती है , क्योंकि नगरीय समुदाय अच्छे शैक्षिक अवसर प्रदान करते हैं , इसलिए यहाँ प्रस्थिति और गतिशीलता के अवसर भी अधिक होते हैं ।

शहरीकरण के साथ समस्याएं।

शहरीकरण के साथ अनेक समस्याएँ भी जुड़ी हुई हैं । नगरों में रहने के लिए पर्याप्त मकान का न मिलना एक गम्भीर समस्या है । गरीब एवं मध्यम वर्ग के लोगों की मकान की ज़रूरतों से तालमेल करने में सरकार , उद्योगपति , पूँजीपति , उद्यमी , ठेकेदार और मकान मालिक असमर्थ रहे हैं । भारत के बड़े – से – बड़े नगरों की एक – चौथाई आबादी झोपड़ – पट्टियों में रहती है । लाखों लोगों को अत्यधिक किराया देना पड़ता है ।

हमारी लाभोन्मुख अर्थव्यवस्था में निजी भवन मालिक और कॉलोनी बसाने वाले लोग धनी एवं उच्च मध्यम वर्गीय लोगों की तुलना में गरीब एवं मध्यम वर्गीय लोगों के लिए मकान बनाने में कम लाभ देखते हैं ।

परिणामत : शहरों में उच्च किराया देने के बावजूद उपलब्ध मकानों पर अत्यधिक भीड़ है । लगभग आधी जनसंख्या खराब मकानों में रहती है । आवास की समस्या के साथ – साथ नगरों में बेरोज़गारों अथवा कम आय प्राप्त करने वाले लोगों को भोजन और वस्त्र की समस्याओं से भी जूझना पड़ता है ।

भीड़ और लोगों की उदासीनता सम्बन्धी समस्या शहरी जीवन की उपज है । कुछ घर तो इतनी अधिक भीड़ वाले होते हैं कि उनमें एक कमरे में पाँच से छ : व्यक्ति तक रहते हैं । अधिक भीड़ विचलित व्यवहार को प्रोत्साहित करती है एवं बीमारियाँ फैलाती है । इसके अतिरिक्त निर्वैयक्तिकता के कारण नगर के लोग दूसरे लोगों के मामलों में उलझना नहीं चाहते , इसलिए अन्य लोगों के प्रति उदासीन बने रहते हैं । यह बात ‘ बशीर बद्र ‘ की इन पंक्तियों से भी साबित होती है

” कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से ,

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो । “

यातायात की समस्याएं

भारत के नगरों में परिवहन एवं यातायात की तस्वीर असन्तोषजनक है । कारों , मोटरसाइकिलों आदि की बढ़ती संख्या ने यातायात की समस्या को और अधिक भीषण बना दिया है । इन वाहनों से निकलने वाला धुआँ वायु को दूषित करता है । इसके अतिरिक्त , बड़े शहरों में दैनिक यात्रियों के लिए चलने वाली बसों या मेट्रो की संख्या पर्याप्त नहीं है , जिसके कारण लोगों को वाहनों की घण्टों प्रतीक्षा करनी पड़ती है । साथ ही यातायात बाधित होने के कारण भी उनका बहुमूल्य समय नष्ट होता है ।

शहरीकरण का स्वास्थ पर प्रभाव।

भारतीय नगरों में नगरपालिकाएँ और निगम कुव्यवस्थाओं से इतने अधिक घिरे रहते हैं कि उन्हें अन्य सब कार्यों में तो रुचि रहती है , परन्तु सफ़ाई में , विशेष रूप से कूड़ा हटाने , नालियों की सफ़ाई और सीवरों में रुकावटों को साफ़ करने में कोई रुचि नहीं रहती । भीड़ वाले शहरी क्षेत्रों में अवैध गन्दी बस्तियों का विस्तार और उनमें रहने वाले लोगों में नागरिक समझदारी की कमी होने के कारण चारों ओर गन्दगी के ढेर लगे रहते हैं , जो बीमारियों को न्योता देते हैं ।

भारत के अधिकतर शहरों में सम्पूर्ण मल निष्क्रमण का लगभग 40-60 % भाग और औद्योगिक , सड़े पदार्थों का गन्दा पानी बिना शुद्ध किए ही पास की नदियों में बहा दिया जाता है । छोटे – छोटे कस्बों में भी खुली नालियों के द्वारा गन्दगी निकट बहने वाली नदी या नाले में बहा दी जाती है । शहरी कारखाने अपनी चिमनियों से धुआँ एवं गन्दी गैसें छोड़कर वातावरण को प्रदूषित करते हैं । शहरों में गाड़ियों की दिनों – दिन बढ़ती संख्या के कारण भी वायु प्रदूषण काफ़ी बढ़ जाता है । प्रदूषण का उच्च स्तर अनेक बीमारियों को आमन्त्रण देता है ।

शहरीकरण के समस्या का निवारण।

वर्तमान समय में असमान रूप से विकसित होते नगरों के कारण देश में प्रदूषण आदि की समस्या और घर से कार्यस्थल तक उचित एवं सस्ती परिवहन सुविधा , अच्छे मकान , स्वच्छ वायु – पानी की उपलब्धता का अभाव आदि के समाधान के लिए केवल राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों पर निर्भर न रहकर स्थानीय निवासियों को भी अपनी बस्तियों के पुनरुद्धार के लिए प्रभावशाली ढंग से सक्रिय होना होगा ।

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