नक्सलवाद

नक्सलवाद

नक्सलवाद से सर्वाधिक प्रभावित 

विश्व को सदियों से सत्य , अहिंसा और प्रेम का सन्देश देने वाले महावीर , बुद्ध और गाँधी का देश भारत पिछले चार दशकों से नक्सलवाद का दंश झेल रहा है । घोर हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने वाली इस राष्ट्र विरोधी व्यवस्था ने आज देश के 20 राज्यों के 223 जिलों को अपने प्रभाव में ले लिया है ।

बिहार , झारखण्ड , छत्तीसगढ़ , उत्तर प्रदेश , पश्चिम बंगाल , ओडिशा , आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु नक्सली आतंक से सर्वाधिक प्रभावित राज्य हैं । 

नक्सली हिंसा के शिकार

यदि आँकड़ों की बात की जाए , तो वर्ष 2007 से 2009 तक 1,400 से भी अधिक लोग नक्सली हिंसा के शिकार हुए , जबकि 754 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए । वर्ष 2010 , 2011 एवं 2012 में क्रमश : एक हज़ार से अधिक , छ : सौ से अधिक एवं चार सौ से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी ।

वर्ष 2013 , 2014 , 2015 , 2016 एवं 2017 में भी क्रमश : चार सौ , साढ़े तीन सौ , पाँच सौ , पाँच सौ तथा साढ़े चार सौ लोग नक्सली हिंसा की भेंट चढ़ गए । इन मृतकों में आम लोगों के साथ – साथ बड़ी संख्या में पुलिस जवान भी शामिल हैं ।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010 में आन्तरिक सुरक्षा पर मुख्यमन्त्रियों के सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमन्त्री डॉ . मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद को देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए  सबसे बड़ा खतरा बताया गया है।

इसी सम्मेलन के दो माह के पश्चात् अप्रैल , 2010 में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के दन्तेवाड़ा जिले में सीआरपीएफ के 75 जवानों को घेरकर मार डाला था । वर्ष 2014 में भी नक्सलियों ने हिंसा का दौर जारी रखते हुए 11 मार्च को सुकमा छत्तीसगढ़ ) में 11 सीआरपीएफ जवानों , 4 पुलिसकर्मियों व एक नागरिक को , 11 मई को गढ़चिरौली ( महाराष्ट्र ) में 7 पुलिस कमाण्डो को एवं 4 जुलाई को जमुई ( बिहार ) में सीआरपीएफ के डिप्टी कमाण्डेण्ट को मौत की नींद सुला दिया वर्ष 2017 में छत्तीसगढ़ के सुकमा में ही नक्सलियों ने हमला कर 11 जवानों को मौत के घाट उतार दिया ।

इन आँकड़ों से नक्सलियों के नापाक इरादों का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । नक्सलवादी प्राय : रेलों , सरकारी वाहनों , सड़कों मपुलो , सरकारी विद्यालयों , सरकारी अस्पतालों , पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों के शिविरों और उनके काफ़िलों को अपना निशाना बनाते हैं ।

भारत में नक्सलवाद

वैसे तो भारत में नक्सलवाद स्वाधीनता संग्राम से पहले ही साम्यवादी या अन्य क्रान्तिकारी विचारधारा के रूप में अपनी जड़े जमा चुका था , किन्तु इसे यह नाम पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी नामक स्थान से मिला । मार्च , 1967 में इस गाँव के एक आदिवासी किसान बियल किसन के खेत पर स्थानीय भू – स्वामियों ने अधिकार कर लिया । इसकी प्रतिक्रियास्वरूप उस क्षेत्र के आदिवासियों ने भू – स्वामियों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह कर दिया । इस विद्रोह को साम्यवादी क्रान्तिकारियों का भारी समर्थन मिला । धीरे – धीरे इस तरह के विद्रोह भारत में अन्य जगहों पर भी होने लगे और उन्हें नक्सलबाड़ी में हुए ऐसे प्रथम विद्रोह के नाम पर नक्सलवादी विद्रोह का नाम दिया गया । इस प्रकार , विद्रोह के एक नए रूप नक्सलवाद का प्रादुर्भाव हुआ ।


नक्सलवाद मार्क्सवादी एबीएम माओवादी सिद्धांतो से प्रभावित हैं मार्क्सवाद जन्हां साम्यवादी विचारधारा को बढ़ावा देता है, वहीं माओवाद अपने हक के लिए सशस्त्र क्रांति पर जोर देता है। माओ चीन के सशस्त्र क्रांति के प्रसिद्ध नेता थे,जिसका मानना था की राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती हैल इस तरह नक्सलवाद भू –  स्वामी के विरुद्ध आदिवासियों का एक ऐसा सशस्त्र विद्रोह है, जो अपनी मार्क्सवादी विचारधारा को लागू करने के लिए माओवादी तरीके अपनाने पर जोर देते है। 


नक्सलवाद को शुरू में ‘ कन्हाई चटर्जी ‘ नामक साम्यवादी का साथ मिला , किन्तु भू – स्वामियों के विरुद्ध आदिवासियों के सशस्त्र विद्रोह को लेकर साम्यवादियों में मतभेद थे , इसलिए कन्हाई चटर्जी के समर्थकों , जो सशस्त्र विद्रोह के पक्षधर थे , ने मिलकर मई , 1969 में ‘ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इण्डिया ‘ ( मार्क्सवादी – लेनिनवादी ) नामक राजनीतिक पार्टी का गठन किया । इस पार्टी के संस्थापक सदस्यों में कानू सान्याल एवं चारु मजूमदार के नाम उल्लेखनीय हैं । 


प्रारम्भ में यह विद्रोह पश्चिम बंगाल तक सीमित था , किन्तु धीरे – धीरे यह ओडिशा , बिहार , झारखण्ड , आन्ध्र प्रदेश उत्तर प्रदेश , महाराष्ट्र , छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में भी फैल गया । पहले इसका उद्देश्य अपनी वास्तविक हक की लड़ाई था किन्तु अब यह बहुत ही हिंसक विद्रोह के रूप में देश के लिए एक गम्भीर समस्या एवं चुनौती बन चुका है ।

कुछ कारण


जिस प्रकार हर विद्रोह के पीछे कुछ – न – कुछ कारण होता है , उसी प्रकार नक्सलवाद के कारणों को निम्नलिखित सन्दर्भो से जोड़कर देखा जा सकता है ।


बहुल इलाके विकास से कोसों दूर हैं । वहाँ प्राथमिक विद्यालय एवं अस्पताल की बात तो दूर , शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं हैं । इसके अतिरिक्त वहाँ पक्की सड़कें अभी तक नहीं बनाई जा सकी है जिसके कारण ये क्षेत्र मुख्य क्षेत्रों से पूरी तरह से कटे हुए हैं । 


पहले पूर्णत : वनों पर निर्भर थे । वन उन्मूलन एवं अवैध कारोबारियों द्वारा वनों पर कब्जा करने के कारण उनके सामने रोज़ी – रोटी का संकट खड़ा हो गया है । 


in क्षेत्रों में निर्धनता , बेरोज़गारी , अशिक्षा , कुपोषण और अज्ञानता के कारण भी नक्सलवाद को बढ़ावा मिला है अथवा कुछ स्वार्थी लोग उन्हें दिग्भ्रमित कर अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहे हैं । 


•यद्यपि भारत सरकार ने दलितों , आदिवासियों एवं कृषक समुदाय के हितों के संरक्षण के लिए कई कानून पारित किए हैं किन्तु अब तक उन्हें समुचित रूप से लागू नहीं किया जा सका है । 


•भू – स्वामियों का भूमि पर अवैध कब्ज़ा एवं सूदखोर महाजनों द्वारा आदिवासियों एवं दलितों का शोषण भी नक्सलवाद को बढ़ाने के लिए बहुत हद तक ज़िम्मेदार है ।


नक्सली आदिवासी – बहुल गाँवों में जाकर प्रत्येक परिवार से एक बच्चे , किशोर , युवक या युवती को अपने सशस्त्र संगठनों में ज़बरदस्ती भर्ती करते हैं या बेरोज़गारी , अशिक्षा , भूख , गरीबी इत्यादि का लाभ उठाते हुए उन्हें बहलाकर अपने साथ जोड़ लेते हैं । नक्सलवादी आज अत्याधुनिक लैपटॉपों , कम्प्यूटरों , मोबाइल एवं सैटेलाइट फ़ोनों से लैस हो चुके तथा अपने खर्चों के लिए वे लोगों से रंगदारी भी वसूलते हैं ।


दिसम्बर , 2014 में बोडो उग्रवादियों द्वारा असम के लगभग 80 निर्दोष आदिवासियों की हत्या करने की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था , किन्तु केन्द्र में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने नक्सलवाद सहित अन्य हिंसक गिरोहों से निपटने के लिए नई नीति तैयार की है , जिसके तहत वामपन्थी अतिवाद के विरुद्ध लड़ाई में अल्पकालिक लक्ष्यों की प्राप्ति पर अधिक बल दिया जा रहा है । यह नई नीति लाल आतंक के साये वाले नक्सल ग्रस्त देश के 88 क्षेत्रों में सर्वाधिक प्रभावित 23 जिलों पर केन्द्रित है । इस नीति के अनुसार , राज्य सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में तीन वर्ष की स्थायी अवधि हेतु सबसे कुशल जिलाधिकारी , पुलिस अधीक्षक , एसडीओ एवं एसएचओ को नियुक्त किया जाता है ।

समाधान

अब नक्सलवाद आतंकवाद का रूप ले चुका है , इसलिए इसका शीघ्र समाधान आवश्यक है । नक्सलवाद की समस्या का सही समाधान यही हो सकता है कि जिन कारणों से इसमें वृद्धि हो रही है , उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाए । इसमें आदिवासी इलाकों के विकास से लेकर आदिवासी युवक – युवतियों को रोज़गार मुहैया कराने जैसे कदम अत्यधिक कारगर साबित होंगे । कुछ इलाकों में आदिवासी अपने हक के लिए भी लड़ रहे हैं । ऐसे इलाकों की पहचान कर उन्हें उनका अधिकार प्रदान करना अधिक उचित होगा । कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि नक्सलवाद की समस्या के समाधान के लिए एक व्यापक रणनीति बनाते हुए आदिवासी इलाकों का विकास करना अत्यन्त आवश्यक है । इधर कुछ वर्षों से भारत के कुछ प्रान्तों में नक्सलवाद की तरह अन्य हिंसक गिरोह भी सक्रिय देखे जा रहे हैं ।

2 thoughts on “नक्सलवाद”

Leave a Comment