सम्राट अशोक

सम्राट अशोक भारतीय इतिहास का सबसे सफल सम्राट में से एक जिसे हर को जनता होगा जो हमारे देश तो गौरवान्वित किया है।ये महान सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य का पौत्र और सम्राट बिन्दुसार का पुत्र था जो मौर्य साम्राज्य का तीसरा और सबसे सफल सम्राट बना जिसके विचारो को लोग आज भी याद करते है।सम्राट अशोक का पूरा नाम देवनांप्रिय प्रियदर्शी अशोक था। अशोक का माता धर्मा , शिभद्रंगि पिता बिन्दुसार थे। अशोक के पत्नी देवी, आसंघमित्रा,कारुवकी और पद्मावती थी।उसके संतान में पुत्र महेंद्र ,कुणाल , तिवाल और पुत्री संघमित्रा, और चारूमती थी।
सम्राट अशोक के जन्म के पहले एक बार महात्मा बुद्ध राजगृह में भिक्षा मांगने आए थे उस समय एक बालक भी भिक्षा दिया और मांगा मै राजा बनूंगा और मेरा राज्य पूरे धरती पर होगा और चला गया तभी एक भिक्षु ने बुद्ध से पूछा उसने ऐसे क्या दे दिया जिस से आप इतना प्रसन्न हो गए तभी बुद्ध बोलते तुमने देखा उसने अपने भिक्षा में मुझे मिट्टी दिया आन्न ये उस बालक का बहुत बड़ा कृतज्य है।और मेरी मृत्यु के सौ वर्ष बाद पाटलिपुत्र में इसका दुबारा जन्म होगा और ये बड़ा होकर अशोक नाम का राजा बनेगा ये यशस्वी धर्म राज चक्रबर्ती होगा।
 प्राचीन ग्रंथ अशोकवादान के आधार पर  अशोक की मा तब की चंपा और अभी की चंपारण के रहने वाली थी कुछ ग्रंथो में अशोक की मा को धम्मा और शुभद्रंगी कहा गया है।
 किसी ज्योत्षी ने शिभद्रंगी के पिता को बोला कि आपकी बेटी की शादी बहुत बड़े राजा से होगा और उसके दो बेटो में से एक चक्रबर्ती सम्राट बनेगा ।यही सुन कर शुभद्रांगी के पिता उसे लेकर पाटलिपुत्र लेकर आ गए और उन्हें मगध के राजा बिन्दुसार को सौप दिया। शूभद्रंगी रानी बन गई मगर जल्दी ही शुभद्रंगीं षड्यंत्र का शिकार हो गए और बाद में जब राज खुला तो राजा बिन्दुसार ने शुनभद्रंगी को अपनी प्रमुख रानी बना दिया 
शुभद्रंगि ने एक बेटे का जन्म दिया जिसका नाम अशोक दिया  लेकिन बिन्दुसार ने जब अशोक को देखा तो खुशी नहीं हुई क्यूंकि अशोक का त्वचा रूखी थी तो बिन्दुसार ने कुरूप मान कर ठुकरा दिया।अशोक के बारे में ऐसा लग नहीं रहा था कि वो मगध का यासशवी सम्राट बनेगा उसे तो राजा बनने पर भी संदेह था।
क्यूंकि बिन्दुसार के अलग अलग रानियो से 101 पुत्र थे अगला मगध का सम्राट इन्हीं में से किसी एक को होना था यानी अशोक को मगध का राजा बनने का रास्ता आसान नहीं था।
समय आ गया सभी भाइयों में से किसने राजा बनाने के लिए प्रतिभा का परीक्षा होने का आदेश मिला।
अशोक परीक्षा देना नहीं चाहता था क्यूंकि उसको लगता था कि वो कुरूप होने के कारण बिन्दुसार उसने कोई रुचि नहीं लेंगे लेकिन माता शूभद्रंगि के कहने पर परीक्षा देने गया।
अशोक का भाग्य बदलने ही वाला था अशोक मगध की राजधानी पाटलिपुत्र से राजवन की ओर बढ़ा रास्ते में उस बिन्दुसार के मंत्री राधागुप्त मिले। रधागुप्त हाथी  पर सवार होकर राजवण की ओर जा रहे थे तो वे अशोक को अपने साथ बैठा लिया।
सभी राजकुमार राज वन पहुंच गए थे। परीक्षा हो गया तब बिन्दुसार ने गुरुदेव पिगलबख्स पूछा बताइए मेरे बाद इसमें से कौन मगध का राजा बनेगा।
पिग्लबखस को को 101 राजकुमार में सबसे समर्थवान लगा वो राजा बिन्दुसार का प्रिए नहीं था इस लिए पिंगलबखस को लगा कि अगर राजा को ये बात अच्छा नहीं लगा तो मेरी जनी भी जा सकता है तो वे बोले मै भविष्यवाणी आवश्य करूंगा लेकिन नाम नहीं बताऊंगा और वो अपने भाषा में बोले जिसकी सवारी सर्वश्रेष्ठ है। और राजकुमारों में जिसका आसन्न बर्तन  सर्वश्रेष्ठ है वहीं मगध का राजा बनेंगे।
अशोक पूरी तरह समझ गया क्यूंकि अशोक ने हाथी का सवारी भूमि पर मिट्टी की बर्तन में खाया था जो सभी राजकुमारों में सर्वश्रेष्ठ था। और अब मानने भी लगा कि मगध का उत्तराधिकारी मै ही हूं।
लेकिन सिर्फ अशोक का मानने से उसको मगध का गद्दी नहीं मिल सकता था उसके युद्ध कौशल का लोहा सब मानते थे लेकिन स्वयं बिन्दुसार उसको उत्तराधिकारी के लिए तैयार नहीं थे राजा बिन्दुसार अपने बड़े बेटे शुशिम को उतराधिकारी बनाना चाहते थे। इसी समय तक्षशिला में विद्रोह हो गया तो राजा बिन्दुसार अशोक को तक्षशिला जाने का आदेश दिया।
अशोक ,हाथी ,घुड़सवार,और पैदल सेना के साथ तक्षशिला में हो रहे विद्रोह को दबाने के लिए चला पड़ा। लेकिन  विद्रोह का दबाने के न कोई अस्त्र न कोई सस्त्र था खुद अशोक के पिता बिन्दुसार उसके साथ छल कर रहे थे।
लेकिन जब अशोक तक्षशिला पहुंचा तो उसे हथियार उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ी और तक्षशिला के कुछ मील दूर से उसके मार्ग पर फूल बिछा दिए।
तक्षशिला में उसके सफलता के बाद उसको उज्जैन का गवर्नर बना दिया गया।जब आशोक उज्जैन में था तभी पाटलिपुत्र में गद्दी के लिए सुगबुगाहट होने लगी।लेकिन राजकुमार सुशिम् ने मजाक में ही उसने एक मंत्री के सर पर हाथ फेर रहा था तो मंत्री में सोचा ये तो आज सर पर हाथ फेर रहा को गर्दन पर तलवार भी रख देगा। लेकिन उसने उस समय तो कुछ नहीं कहा लेकिन उसने एक बड़ा व्यूह रचना शुरू कर दिया। और राजकुमार अशोक का समर्थन करने वालों की संख्या बढ़ रही थी। लेकिन सम्राट बिन्दुसार के नजर में मगध का उतराधिकारी शुशीम ही था।शुशिम् की परीक्षा का घड़ी जल्दी ही आ गए और तक्षशिला एक बार फिर विद्रोह हो गया। इस बात बिन्दुसार में शुषीम को तक्षशिला भेजा और इधर बिन्दुसार का तबियत अचानक बिगड़ गई।
बिन्दुसार ने आदेश दिया कि राजकुमार शुषिम् को पाटलिपुत्र बुलाया जाए और उन्होंने मंत्री राधागुप्त को आदेश दिया। राधागुपत के बारे में कहा जाता है कि जिस तरह चाणक्य को चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाने में हाथ था उसी तरह राधागुप्ट को अशोक को राजा बनने में  हाथ था।जब बिन्दुसार ने रधागुपट को आदेश दिया तो उसने महाराज बिन्दुसार का आदेश का पालन किया लेकिन बिन्दुसार के साथ छल किया उसने शूषिम् को संदेश भेजने में जानबुझ कर देर कर दिया और उसने अशोक को पाटलिपुत्र आने को कहा जब अशोक पाटलिपुत्र आया तो उसके शरीर को हल्दी लगा कर पीला कर दिया जिस से वो बीमार दिखे और अशोक के बीमार होने का खबर पूरे राज्य में फैला दिया।उधर बिन्दुसार की तबियत और खराब हो गई बिन्दुसार शूषिम को आने के लिए टकटकी लगाए इंतजार कर रहा था लेकिन वहां शुशिम्म के जगह पर अशोक पहुंच गया और जब रधागुपत ने अशोक को राज्याभिषेक करने को कहा हो वो इनकार करता रहा लेकिन अशोक ने पूरे पाटलिपुत्र पर कब्जा कर लिया इसी के साथ अशोक मौर्य साम्राज्य की तीसरा सम्राट तो बन गया 
लेकिन सत्ता की लड़ाई अभी शांत नहीं हुआ था शुशिम तक्षशिला से वापस पाटलिपुत्र लौट रहा था जो सत्ता के लड़ाई का मुख्य केंद्र था और सुशिम पाटलिपुत्र का घेराबंदी करने लगा।तभी अशोक और राधागुपट मिलकर उसे छल से मारने की योजना बनाई और दोनों ने मिलकर एक षड्यंत्र रचा जिसने राधा गुप्त ने पाटलिपुत्र के पूर्वी द्वार पर अशोक के पुतला  को एक लकड़ी के हाथी पर बैठा कर राधा गुप्त ने सुषिम को अशोक से करने के लिए उकसाया वो राधा गुप्त ने बीच में गढढा खुदवाया जिसमे जलते हुए लकड़ी और कोयला डाल दिया जब सुषिम आगे बढ़ा तो वो गढ़धे में गिर कर जल गया और उसके साथ सुशीम का अंत हो गया फिर अशोक ने अपने कुल 99 भाइयों का हत्या करके मगध के गद्दी पर बैठा और जब 272 ई सा पूर्व  राजा बिन्दुसार का मृत्यु हो गया और उसके 4 वर्ष बाद उसको औपचारिक तरीके से राज्याभिषेक हुआ और वो औपचारिक तरीके से मौर्य साम्राज्य का तीसरा सम्राट बना।
लेकिन इसके बाद जो हुआ जिसमे सम्राट अशोक का अलग रूप आता पाटलिपुत्र के सैकड़ों नारिया उसके हरण में रहता था लेकीन उसमे से कई नारिया को अशोक को छूने से घृणा करती थी और ये बाात पता चल जाता है तो अशोक ने उन सभी सैकड़ों नारियों को जिंदा जलाने का आदेश देता तो और सभी को जिंदा जला किया जाता है अशोक को 99भाइयों को हत्या और इस नारी हत्या काण्ड के कारण उसको चंड अशोक से भी जाना जाता था।
एक दिन की बात है पाटलिपुत्र के महल के सामने से एक।  बौद्ध भिक्षु गुजर रहा था तब अशोक का नजर उस भिक्षु पर पड़ा तो उसने उस भिक्षु को अपने महल में बुलाया।
अशोक ने जब उस भिक्षु से उसका परिचय पूछा तो उसने अपना  नाम सूषिम पुत्र निग्रोथ बताया और बोला मै एक बौद्ध भिक्षु हूं।यह सुन कर अशोक नीग्रोथ तो देखता रह गया जो अभी तक अशोक का सबसे बड़ा शत्रु हुआ करता था उसका बेटा उसके सामने उसके आंखों में आंखे डाल कर बिना किसी डर के, न किसी भय के,और न ही उसके आंखों में क्रोध तब वो बिल्कुल निडर अशोक के सामने खड़ा था।
लेकिन अशोक ने उसके साथ इज्जत के साथ पेश आया बोला तुमको जंहा इच्छा है वन्हा बैठ जाओ तो निग्रोथ ने राजगद्दी पर बैठ गया और उसने महात्मा बुद्ध के उपदेश को बारे ने बताने लगा जिस से अशोक पर असर पड़ने लगा और अब चंड अशोक से धर्म अशोक बनाने लगा। तत्पश्चात वे मोगली पुत्र तिस्स के प्रभाव में आकर पूर्ण रूप से बौद्ध हो गए।
और उन्होंने अपने पुत्र और पुत्री महेंद्र और संघमित्रा को श्रीलंका बौद्ध धर्म प्रचार प्रसार के लिए भेजा और वो अपने के दूत अलग अलग देश जैसे श्रीलंका, आफ़गानिस्तान,मिस्त्र यूनान तिब्बत इत्यादि देश भेजे।
लेकिन सम्राट अशोक के सामने मौर्य साम्राज्य का विस्तार का भी प्रश्न था जो आज उड़ीसा है वो उस समय कलिंग नाम से जाना जाता था जो चन्द्रगुप्त मौर्य और बिन्दुसार के कोशिशों के बाबजूद मौर्य साम्राज्य का हिस्सा नहीं बन पाया था 
तो अशोक ने अपने शासन काल के 8वे वर्ष उसने कलिंग पर आक्रमण किया जिसमे उसने अपने पूरी ताकत लगा दिया लेकिन कलिंग का विशाल सेना अशोक की सेना को कड़ी चुनौती दे रहा था ये युद्ध खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था युद्ध में हो रहे भयंकर विनाश और गहरे रक्तपात से अशोक व्यथा में डूबता जा रहा था लेकिन अशोक ने कलिंग पर विजय प्राप्त किया  उस युद्ध में लगभग 1लाख लोगो की मौत और कई लाख घायल हुआ था इस नरसंहार से  उसको बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा लेकिन जब वो विजय प्राप्त कर पाटलिपुत्र लौटा तो वो अशोक पूरी तरह से बदला हुआ था जिस अशोक को युद्ध और शिकार पसंद था वो अशोक अब सत्य,अहिंसा और सदाचार की बाते करने लगा था। और ये अशोक का नया अवतार था और उसने इसी कलिंग युद्ध के बाद युद्ध नहीं करने का संकल्प लिया और उसने कहा कि मेरा साम्राज्य विस्तार अब युद्ध से नहीं होगा मेरा साम्राज्य विस्तार अब धर्म से होगा।और मै अब धम्म विजय करेंगे।

अशोक पर बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था लेकिन अशोक का “धम्म” का मतलब बौद्ध धर्म नहीं बल्कि उस से बिल्कुल अलग अशोक का धम्मा का अर्थ था “नैतिक आचरण” 
अशोक ने रास्तों में राहगीर के लिए पेड़ लगवाया ,कुआं खुदवाया, ठहरने के लिए सराय बनवाया इसके अलाने उन्होंने पशुओं के लिए चिकित्सा  खोलवाय।
अशोक अपने संदेश और आदेश शिलालेख और स्तंभों के जरिए पूरे साम्राज्य के हर कोने तक पहुंचाया।
अशोक दान भी देता था लेकिन जब वो बूढ़ा हुआ और वो बीमार पर गया तब भी दान देना नहीं छोड़ा जब को बीमार पड़ा था तो भी वो दान देता रहा वो दान के रूप में वो जिस स्वर्ण की बर्तन में खाता था उसको दान में दे देता था जब वह दान देता था तो उस चांदी के बर्तन में खाना मिलने लगा फिर कांस्य बर्तन में मिलने और अंत आते आते उस मिट्टी के बर्तन में मिलने लगा 
जब अशोक को लगा अब मै नहीं बचूंगा तो उसने अपने महामात्य राधा गुप्त तो एक आधा आंबला दिया और बोला कि इसे संघ में उपस्थित बौद्ध भिक्षुओं में बाट दो
आंबला को सूप के जरिए सभी बौद्ध भिक्षुओं में बाट दिया गया और जैसे ही वाटा गया महल में अशोक ने अपनी अंतिम सांस ली और एक महान सम्राट का अंत हो गया 
अशोक महान की मृत्यु आज से लगभग 2300 वर्ष पूर्व हुआ लेकिन अशोक महान आज भी अपने विचारो के कारण आज भी जीवित हअशोक का दिया गया चार सिंह वाला अशोक स्तम्भ आज हमारे देश का राष्ट्रीय चिह्न बन गया और अशोक का दिया गया अशोक चक्र जो हमारे देश का तिरंगे में हमारे देश की शान बढ़ाता है।
आज अशोक को दुनिया के महान विद्वानों ने   सेंटपौल,अकबर, इटनियास, सीजर  नेपोलियन इत्यादि से तुलना किया जाता है।अशोक हमेशा अब आकाश में प्रायः एकाकी तारे की तरह चमकता हैं।

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