गरीबी

भक्त कवि ‘ गोस्वामी तुलसीदास ‘ ने ‘ रामचरित मानस ‘ में लिखा है- “ नहिं दरिद्र सम दुःख जग माही ” अर्थात् इस संसार में गरीबी से बढ़कर दूसरा कोई दु : ख नहीं है । सच भी यही है कि गरीबी की मार खाया व्यक्ति कुछ भी करने को तैयार हो जाता है । गरीबी अथवा निर्धनता एक ऐसी स्थिति है , जिसमें समाज का एक भाग अपनी मूल मानवीय आवश्यकता को पूरा कर पाने में असमर्थ होता है । ये मूल मानवीय आवश्यकताएँ हैं पर्याप्त पौष्टिक आहार , रहने के लिए उपयुक्त स्थान व पहनने के लिए उपयुक्त वस्त्र की उपलब्धता , शिक्षा , ग्रहण करने को साधन एवं अपरिहार्य बीमारियों बचने की क्षमता का वचन है ।


सामान्यत : गरीबी के दो रूप देखे जाते हैं , चिरकालिक गरीबी तथा अल्पकालिक गरीबी


 चिरकालिक गरीबी के अन्तर्गत वैसे लोग आते हैं , जो या तो सदा निर्धन रहते हैं या फिर उनके पास कभी – भी थोड़ा धन आ जाता है । अल्पकालिक गरीबी के अन्तर्गत आने वाले लोग सदा निर्धन रहने वाले वर्ग और गैर – निर्धन वर्ग के बीच झूलते रहते हैं । 


गरीबी किसी भी देश के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है । वैसे तो विश्व के अधिकतर देशों में कुल जनसंख्या का कम या अधिक भाग निर्धनता की स्थिति में जीने को विवश है , किन्तु एशिया एवं अफ्रीका के देशों में अत्यधिक निर्धनता है । निर्धनता की परिभाषा सभी देशों के लिए एक – सी नहीं हो सकती , क्योंकि निर्धनता का आधार जीवनस्तर को माना जाता है और विकसित देशों में साधारण व्यक्ति भी कहीं अधिक ऊँचे जीवनस्तर पर जी रहा होता है । विकसित देशों में जिसके पास अपनी गाड़ी न हो , उसे निर्धन माना जा सकता है , जबकि विकासशील देशों में निर्धनता की माप का यह पैमाना उपयुक्त नहीं कहा जा सकता ।


इसकी की माप सामान्यत : दो प्रचलित विधियों निरपेक्ष विधि और सापेक्ष विधि से की जाती है ।


 गरीबी मापन की निरपेक्ष विधि में एक निश्चित मानदण्ड का निर्धारण किया जाता है । उस मापदण्ड से नीचे आने वाले लोगों को गरीबी की श्रेणी में रखते हैं । भारत जैसे विकासशील देशों में गरीबी मापन की इसी विधि को प्रयोग में लाया जाता है । गरीबी मापन की सापेक्ष विधि में उच्च आय वर्ग तथा निम्न आय वर्ग के बीच तुलना करके दोनों के बीच के विषमता ज्ञात की जाती है , विकसित देशों में गरीबी मापन की यही विधि प्रचलित है । 


वैसे तो भारत में अनेक अर्थशास्त्रियों एवं संस्थाओं ने निर्धनता के निर्धारण हेतु अपने – अपने प्रमाप बनाए हैं , किन्तु इस समय देश में निर्धनता रेखा का निर्धारण भोजन में कैलोरी की मात्रा के आधार पर किया जाता है । भोजन में कैलोरी की मात्रा को आधार बनाकर निर्धनता रेखा का निर्धारण करने के इस तरीके को दाण्डेकर – रथ फॉर्मूला कहा जाता है । भारत में इसका प्रयोग वर्ष 1971 से हो रहा है । इसके अनुसार , शहरी क्षेत्रों में भोजन में प्रतिदिन 2,100 कैलोरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 2.400 कैलोरी न पाने वालों को निर्धनता रेखा से नीचे माना जाता है । योजना आयोग राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के सर्वेक्षणों के आधार पर ही निर्धनता रेखा से नीचे जीवन – यापन कर रहे लोगों की संख्या का आकलन करता है ।


पिछले कुछ वर्षों से निर्धनता रेखा से नीचे जीवन – यापन कर रहे लोगों की पहचान का यह तरीका विवादास्पद बना हुआ है । वर्ष 2008 में योजना आयोग के अधीन सुरेश तेन्दुलकर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया और समिति ने दिसम्बर , 2009 में आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंप दी । समिति ने निर्धनता रेखा के निर्धारण हेतु प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय को आधार बनाया ।


जिसमें वर्ष 2004-05 के दौरान 37.2 % जनसंख्या को निर्धनता रेखा से नीचे बताया गया , जबकि पहले वाले फॉर्मूले की सहायता से किए गए आकलन में 27.5 % जनसंख्या ही निर्धनता रेखा से नीचे थी । तेन्दुलकर समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ष 2004-05 में 41.8 % लोगों को निर्धनता रेखा से नीचे बताया , जबकि पहले वाले फॉर्मूले से यह 28.3 % आकलित था । योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार , इस नए फॉर्मूले के आधार पर वर्ष 2009-10 एवं 2011-12 के दौरान क्रमश : 29-8 % एवं 21.92 % जनसंख्या निर्धनता रेखा के नीचे है । इस रिपोर्ट में ओडिशा , बिहार , उत्तर प्रदेश , छत्तीसगढ़ व झारखण्ड देश के अत्यन्त निर्धन प्रान्त माने गए , जबकि दिल्ली , हरियाणा , पंजाब , केरल आदि ग्रान्तों में अपेक्षाकृत कम निर्धनता पाई गई ।


संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा निर्धनता आकलन
 संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ( यूएनडीपी ) के अनुसार निर्धनता एक बहुआयामी समस्या है , जिसमें केवल आय को आधार न बनाकर अन्य मानकों यथा – स्वास्थ्य एवं पोषाहार क्षमता को भी ध्यान में रखा जाता है । इसके अन्तर्गत 1.90 डॉलर प्रतिदिन व्यय करने वाली जनसंख्या को अत्यधिक गरीब माना जाता है । उल्लेखनीय है कि विश्व बैंक एवं एशियन विकास बैंक ने गरीबी रेखा के अनुमान के सम्बन्ध में क्रमश : 1.25 तथा 1.35 डॉलर प्रतिदिन आय को मानक के रूप में मानता है ।


एक रिपोर्ट के अनुसार , भारत में भूख एक गम्भीर समस्या है तथा 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक ( जीएचआई ) 2017 में भारत 100 पायदान पर है । यह उत्तर कोरिया और बांग्लादेश जैसे देशों से पीछे हैं , लेकिन पाकिस्तान से आगे है इण्टरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ( आईएफआरआई ) ने आपसी रिपोर्ट में कहा कि देश में भूख का स्तर इतना गम्भीर है और सामाजिक क्षेत्रों को इसके प्रति मजबूत प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है । भारत में 5 वर्ष से कम आयु के 40 % से अधिक बच्चों का वजन सामान्य से कम है । रिपोर्ट में दक्षिण एशियाई क्षेत्रों में जहाँ भुखमरी सबसे अधिक है , बच्चों के कुपोषण का प्रमुख कारण सामाजिक असमानता और महिलाओं में पोषण , शिक्षा व सामाजिक स्तर का निम्न होना है , किन्तु अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ( आईएमएफ ) की हाल की रिपोर्ट कहती है कि पिछले 15 वर्षों में भारत के अरबपति समुदाय की कुल सम्पत्ति 12 गुना बढ़ गई है , जिससे स्पष्ट होता है कि यहाँ आय में असमानता तेजी से बढ़ रही है । एक सर्वे के अनुसार , यहाँ के अरबपति समुदाय के पास इतनी दौलत है , जिससे यहाँ की गरीबी दो बार दूर की जा सकती है , वहीं दूसरी ओर इस देश पर वर्ष 2012 तक लगभग ₹ 45 लाख करोड़ का विदेशी कर्ज भी है ।


हमारे देश में निर्धनता के कई कारण हैं जिसमें गरीबी का दुष्चक्र , निम्न प्राकृतिक संसाधन क्षमता , आय का असमान वितरण , सामाजिक सेवाओं तक पहुँच का अभाव , संस्थागत साख तक पहुँच का अभाव , कीमत वृद्धि , रोजगार के अवसरों का अभाव जनसंख्या में तीव्र वृद्धि , कृषि में निम्न उत्पादकता , गुणवत्तापूर्ण एवं व्यावसायिक शिक्षा का अभाव के अतिरिक्त सामाजिक कुरीतियाँ ( जाति प्रथा , शाही मृत्यु भोज पर व्यय ) आदि शामिल हैं । उपर्युक्त कारणों को भारत में गरीबी के लिए जिम्मेदार माना जाता है । 


निर्धनता के प्रभावस्वरूप समाज में कई तरह की विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं तथा भुखमरी की समस्या , मानसिक अशान्ति के कारण हिंसा व अपराध की घटनाओं में वृद्धि होती है ।


भारत में निर्धनता उन्मूलन व रोजगार सृजन हेतु सरकार द्वारा उठाए गए कदम


 सरकार द्वारा समावेशी विकास प्राप्त करने हेतु निर्धनता उन्मूलन तथा रोजगार सृजन हेतु कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । सर्वप्रथम देश में पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में गरीबी हटाओ का नारा दिया गया । 


महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम ( एमएनआरईजीए ) का शुभारम्भ केन्द्र सरकार द्वारा ग्रामीण बेरोजगार , भूख और गरीबी से निजात पाने के लिए फरवरी , 2006 गया । सरकार की इस महत्त्वाकांक्षी योजना के अन्तर्गत प्रत्येक ग्रामीण परिवार के सक्षम एवं इच्छुक व्यक्ति को 100 दिनों का ( एक वित्त वर्ष में ) काम दिया जाता है।


राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना एक स्वरोजगार कार्यक्रम है । जिसका प्रारम्भ अप्रैल 1999 में ग्रामीण निर्धन परिवारों को ( स्वरोजगार , बैंक ऋण तथा सरकारी आर्थिक सहायता से आय सृजन की परिसम्पत्तियाँ उपलब्ध कराकर , निर्धनता से ऊपर उठाने के उद्देश्य से किया था । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 से स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना ( एसजीएसवाई ) को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ( एनआरएलएम ) के रूप में पुनर्गठित कर दिया गया । 


केन्द्र सरकार द्वारा शहरी और ग्रामीण गरीबों के लिए दीन दयाल उपाध्याय अन्त्योदय योजना का वर्ष 2014 में प्रारम्भ किया गया । योजना का मुख्य उद्देश्य कौशल विकास और अन्य उपायों के माध्यम से आजीविका के अवसरों में वृद्धि कर शहरी और ग्रामीण गरीबों को कम करना है ।


जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण कर , शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार करते हुए व्यावसायिक एवं व्यावहारिक शिक्षा पर जोर देकर , कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर एवं औद्योगीकरण द्वारा रोजगार के अवसर सृजित कर निर्धनता की स्थिति को कम किया जा सकता है ।


 कुछ लोग निर्धनों को आर्थिक सहायता देने की बात करते हैं , जो इसका स्थायी समाधान नहीं है । निर्धनों को स्वावलम्बी बनाकर ही निर्धनता की समस्या का स्थायी समाधान सम्भव है । केवल आर्थिक सहायता देकर निर्धन वर्ग को थोड़े समय के लिए तो अभाव मुक्त किया जा सकता है , किन्तु इससे निर्धनता की समस्या जड़ से नष्ट नहीं हो सकती केवल आर्थिक सहायता दे देने से निर्धन वर्ग आलसी व कामचोर हो जाता है और उसकी प्रवृत्ति सदा दूसरे पर निर्भर रहने की हो जाती है ।


भारत में प्राचीन काल से ही गरीबों को दान देने की परम्परा रही है । इसका सार्थक परिणाम न पहले हासिल हो सका और न ही भविष्य में इससे कोई लाभ होने वाला है । हमारे देश में निर्धनों को आर्थिक सहायता के नाम पर जितनी धनराशि व्यय की जाती है , उसका सदुपयोग यदि उन्हें स्वावलम्बी बनाकर स्वरोज़गारोन्मुख करने में किया जाए , तो परिणाम नि : सन्देह सार्थक होंगे । कई बार तो यह भी देखा जाता है कि आर्थिक सहायता के नाम पर सरकार या अन्य गैर – सरकारी संगठनों से निर्गत धनराशि गरीबों तक पहुँच भी नहीं पाती , उसे अन्य लोग बीच में ही समाप्त कर देते हैं । ऐसी स्थिति में व्यवस्था में सुधार करने के साथ – साथ आम नागरिक को भी ईमानदारीपूर्वक अपने कर्त्तव्य पथ पर चलते हुए देश से निर्धनता दूर करने में सहयोग करना चाहिए । महात्मा गाँधी ने कहा है- “ गरीबी दैवीय अभिशाप नहीं , मानवीय सृष्टि है । ” सचमुच हम सब ठान लें , तो गरीबी से अवश्य ही छुटकारा पा सकते हैं ।

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